ग़ज़ल

क्षमा

दुष्यंत कुमार · सब कलाम देखें
"आह!मेरा पाप-प्यासा तनकिसी अनजान, अनचाहे, अकथ-से बंधनों मेंबँध गया चुपचापमेरा प्यार पावनहो गया कितना अपावन आज!आह! मन की ग्लानि का यह धूम्रमेरी घुट रही आवाज़!कैसे पी सकाविष से भरे वे घूँट...?जँगली फूल सी सुकुमार औ’ निष्पापमेरी आत्मा पर बोझ बढ़ता जा रहा है प्राण!मुझको त्राण दो...दो...त्राण...."
और आगे कह सका कुछ भी न मैंटूटे-सिसकते अश्रुभीगे बोल मेंसब बह गए स्वर हिचकियों के साथऔ’ अधूरी रह गई अपराध की वह बातजो इक रात....।बाक़ी रहे स्वप्न भीमूक तलुओं में चिपककर रह गए।और फिरबाहें उठीं दो बिजलियों सीनर्म तलुओं से सटा मुख-नमआया वक्ष पर उद्भ्रान्त;हल्की सी ‘टपाऽटप’ ध्वनिसिसकियाँऔर फिर सब शांत....नीरव.....शांत.......।
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