ग़ज़ल
इस मोड़ से तुम मुड़ गई
इस मोड़ से तुम मुड़ गई फिर राह सूनी हो गई।
मालूम था मुझको कि हर धारा नदी होती नहींहर वृक्ष की हर शाख फूलों से लदी होती नहींफिर भी लगा जब तक क़दम आगे बढ़ाऊँगा नहीं,कैसे कटेगा रास्ता यदि गुनगुनाऊँगा नहीं,यह सोचकर सारा सफ़र, मैं इस क़दर धीरे चलालेकिन तुम्हारे साथ फिर रफ़्तार दूनी हो गई!
तुमसे नहीं कोई गिला, हाँ, मन बहुत संतप्त है,हर एक आँचल प्यार देने को नहीं अभिशप्त है,हर एक की करुणा यहाँ पर काव्य की थाती नहींहर एक की पीड़ा यहाँ संगीत बन पाती नहींमैंने बहुत चाहा कि अपने आँसुओं को सोख लूँतड़पन मगर उस बार से इस बार दूनी हो गई।
जाने यहाँ, इस राह के, इस मोड़ पर है क्या वजहहर स्वप्न टूटा इस जगह, हर साथ छूटा इस जगहइस बार मेरी कल्पना ने फिर वही सपने बुने,इस बार भी मैंने वही कलियाँ चुनी, काँटे चुने,मैंने तो बड़ी उम्मीद से तेरी तरफ देखा मगरजो लग रही थी ज़िन्दगी दुश्वार दूनी हो गई!
इस मोड़ से तुम मुड़ गई, फिर राह सूनी हो गई!
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