मैथिलीशरण गुप्त

मैथिलीशरण गुप्त

1886-1964
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त खड़ी बोली हिन्दी काव्य के प्रवर्तक कवियों में थे। उनकी कृति "साकेत" और "भारत-भारती" विशेष प्रसिद्ध हैं।
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Famous Works

उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उसका लगा,मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा ।
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभीआओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
:::आओ हो वनवासी!अब गृह भार नहीं सह सकती
एक सफेद बड़ा-सा ओला,था मानो हीरे का गोला!
हाँ, निशान्त आया,तूने जब टेर प्रिये, कान्त, कान्त, उठो, गाया---
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,किसमें हो कर आऊं मैं?
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,:स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
अरे भारत! उठ, आँखें खोल,उड़कर यंत्रों से, खगोल में घूम रहा भूगोल!
उठो, हे भारत, हुआ प्रभात।तजो यह तन्द्रा; जागो तात!
::दोनों ओर प्रेम पलता है।सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है!
नर हो, न निराश करो मन कोकुछ काम करो, कुछ काम करो
मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान मेंव्याकुल से देव चले साथ में, विमान में
निरख सखी ये खंजन आएफेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाए
किसी जन ने किसी से क्लेश पायानबी के पास वह अभियोग लाया।
भजो भारत को तन-मन से।बनो जड़ हाय! न चेतन से॥
भारत का झण्डा फहरै।छोर मुक्ति-पट का क्षोणी पर,
भारत माता का मंदिर यहसमता का संवाद जहाँ,
मस्तक ऊँचा हुआ मही का, धन्य हिमालय का उत्कर्ष।हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥
"माँ कह एक कहानी।"बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
जय भारत-भूमि-भवानी!अमरों ने भी तेरी महिमा बारंबार बखानी।
नीलांबर परिधान हरित पट पर सुन्दर है।सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
:::मुझे फूल मत मारो,मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो।
शिशिर न फिर गिरि वन मेंजितना माँगे पतझड़ दूँगी मैं इस निज नंदन में
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
होकर कौतूहल के बस में,गया एक दिन मैं सरकस में।
जो कुछ होनी थी, सब होली!धूल उड़ी या रंग उड़ा है,