ग़ज़ल

जगौनी

मैथिलीशरण गुप्त · सब कलाम देखें
उठो, हे भारत, हुआ प्रभात।तजो यह तन्द्रा; जागो तात!
मिटी है कालनिशा इस वार,हुआ है नवयुग का संचार।उठो; खोलो अब अपना द्वार,प्रतीक्षा करता है संसार।हदय में कुछ तो करो विचार,पड़े हो कब से पैर पसार!करो अब और न अपना घात।उठो, हे भारत, हुआ प्रभात॥
जगत को देकर शिक्षा-दान,बने हो आप स्वयं अज्ञान!सुनाकर मधुर मुक्ति का गान,हुए हो सहसा मूक-समान।संभालो अब भी अपना मान,
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