ग़ज़ल
मुझे फूल मत मारो
:::मुझे फूल मत मारो,मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो।होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो,मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो।नही भोगनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह--यह हरनेत्र निहारो!रूप-दर्प कंदर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,लो, यह मेरी चरण-धूलि उस रति के सिर पर धारो!
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