ग़ज़ल

भारत का झण्डा

मैथिलीशरण गुप्त · सब कलाम देखें
भारत का झण्डा फहरै।छोर मुक्ति-पट का क्षोणी पर,छाया काके छहरै॥
मुक्त गगन में, मुक्त पवन में,इसको ऊँचा उड़ने दो।पुण्य-भूमि के गत गौरव का,जुड़ने दो, जी जुड़ने दो।मान-मानसर का शतदल यह,लहर लहर का लहरै।भारत का झण्डा फहरै॥
रक्तपात पर अड़ा नहीं यह,दया-दण्ड में जड़ा हुआ।खड़ा नहीं पशु-बल के ऊपर,आत्म-शक्ति से बड़ा हुआ।इसको छोड़ कहाँ वह सच्ची,विजय-वीरता ठहरै।भारत का झण्डा फहरै॥
इसके नीचे अखिल जगत का,होता है अद्भुत आह्वान!कब है स्वार्थ मूल में इसके ?है बस, त्याग और बलिदान॥ईर्षा, द्वेष, दम्भ; हिंसा का,हदय हार कर हहरै।भारत का झण्डा फहरै॥
पूज्य पुनीत मातृ-मन्दिर का,झण्डा क्या झुक सकता है?क्या मिथ्या भय देख सामने,सत्याग्रह रुक सकता है?घहरै दिग-दिगन्त में अपनीविजय दुन्दभी घहरै।भारत का झण्डा फहरै॥
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