ग़ज़ल
एकांत में यशोधरा
:::आओ हो वनवासी!अब गृह भार नहीं सह सकती:::देव तुम्हारी दासी!!
राहुल पल कर जैसे तैसे,करने लगा प्रश्न कुछ ऐसे,मैं अबोध उत्तर दूँ कैसे?
:::वह मेरा विश्वासी,:::आओ हो वनवासी!
उसे बताऊँ क्या तुम आओ,मुक्ति-युक्ति मुझसे सुन जाओ--
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