ग़ज़ल
प्रतिशोध
किसी जन ने किसी से क्लेश पायानबी के पास वह अभियोग लाया।मुझे आज्ञा मिले प्रतिशोध लूँ मैं।नही निःशक्त वा निर्बोध हूँ मैं।उन्होंने शांत कर उसको कहा योंस्वजन मेरे न आतुर हो अहा यों।चले भी तो कहाँ तुम वैर लेनेस्वयं भी घात पाकर घात देनेक्षमा कर दो उसे मैं तो कहूँगातुम्हारे शील का साक्षी रहूंगादिखावो बंधु क्रम-विक्रम नया तुमयहाँ देकर वहाँ पाओ दया तुम।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh