ग़ज़ल
शिशिर न फिर गिरि वन में
शिशिर न फिर गिरि वन मेंजितना माँगे पतझड़ दूँगी मैं इस निज नंदन मेंकितना कंपन तुझे चाहिए ले मेरे इस तन मेंसखी कह रही पांडुरता का क्या अभाव आनन मेंवीर जमा दे नयन नीर यदि तू मानस भाजन मेंतो मोती-सा मैं अकिंचना रक्खूँ उसको मन मेंहँसी गई रो भी न सकूँ मैं अपने इस जीवन मेंतो उत्कंठा है देखूँ फिर क्या हो भाव भुवन में।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh