ग़ज़ल

दोनों ओर प्रेम पलता है

मैथिलीशरण गुप्त · सब कलाम देखें
::दोनों ओर प्रेम पलता है।सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है!
सीस हिलाकर दीपक कहता--’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’पर पतंग पड़ कर ही रहता::कितनी विह्वलता है!::दोनों ओर प्रेम पलता है।बचकर हाय! पतंग मरे क्या?प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?जले नही तो मरा करे क्या?::क्या यह असफलता है!::दोनों ओर प्रेम पलता है।कहता है पतंग मन मारे--’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,क्या न मरण भी हाथ हमारे?::शरण किसे छलता है?’::दोनों ओर प्रेम पलता है।दीपक के जलने में आली,फिर भी है जीवन की लाली।किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,::किसका वश चलता है?::दोनों ओर प्रेम पलता है।जगती वणिग्वृत्ति है रखती,उसे चाहती जिससे चखती;काम नहीं, परिणाम निरखती।::मुझको ही खलता है।::दोनों ओर प्रेम पलता है।
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