ग़ज़ल
निरख सखी ये खंजन आए
निरख सखी ये खंजन आएफेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाएफैला उनके तन का आतप मन से सर सरसाएघूमे वे इस ओर वहाँ ये हंस यहाँ उड़ छाएकरके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाएफूल उठे हैं कमल अधर से यह बन्धूक सुहाएस्वागत स्वागत शरद भाग्य से मैंने दर्शन पाएनभ ने मोती वारे लो ये अश्रु अर्घ्य भर लाए।
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