कैफ़ी आज़मी

कैफ़ी आज़मी

1919-2002
अख़्तर हुसैन रिज़वी कैफ़ी आज़मी प्रगतिशील शायर और फ़िल्म गीतकार थे।
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Famous Works

रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या हैदिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है
अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ, लहू तो नहींये कोई और जगह है ये लखनऊ तो नहीं
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करोमुझ से बिखरे हुये गेसू नहीं देखे जाते
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,
आज सोचा तो आँसू भर आएमुद्दतें हो गईं मुस्कुराए
इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मेरा सरमाया हैदोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़र करूँ
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़ेहँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े
अब और क्या तेरा बीमार बाप देगा तुझेबस एक दुआ कि ख़ुदा तुझको कामयाब करे
जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों कोसौ चराग अँधेरे में जगमगाने लगते हैं
ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है?तेरी हर लहर से बारूद की बू आती है!
उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझेक़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज
कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा हैजहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है
कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियोअब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
ख़ारो-ख़स तो उठें, रास्ता तो चलेमैं अगर थक गया, काफ़िला तो चले
कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों हैंवो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं
वो सर्द रात जबकि सफ़र कर रहा था मैंरंगीनियों से जर्फ़-ए-नज़र भर रहा था मैं
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोईतुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
एक दो भी नहीं छब्बीस दियेएक इक करके जलाये मैंने
आज अन्धेरा मेरी नस-नस में उतर जाएगाआँखें बुझ जाएँगी बुझ जाएँगे एहसास ओ शुऊर
झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहींदबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं
ये बुझी सी शाम ये सहमी हुई परछाइयाँख़ून-ए-दिल भी इस फ़ज़ा में रंग भर सकता नहीं
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही होकि जैसे सचमुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल...वापस चल
शगुफ्तगी का लताफ़त का शाहकार हो तुम,फ़क़त बहार नहीं हासिल-ऐ-बहार हो तुम,
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे होक्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करोऔर कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर के हो गए ।जो सर उठा के निकले थे बे सर के हो गए ।
रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगेफिर वहीं लौट के आ जाता हूँ
राम बन-बास से जब लौट के घर में आएयाद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर हैये दौर जो के पुराना नही नया भी नहीं
लो पौ फटी वो छुप गई तारों की अंजुमनलो जाम-ए-महर से वो छलकने लगी किरन
ये सेहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानीउफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसे
नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठनामिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना