ग़ज़ल
आवारा सजदे
इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मेरा सरमाया हैदोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़र करूँकोई क़ातिल सर-ए-मक़्तल नज़र आता ही नहींकिस को दिल नज़र करूँ और किसे जाँ नज़र करूँ?
तुम भी महबूब मेरे तुम भी हो दिलदार मेरेआशना मुझ से मगर तुम भी नहीं तुम भी नहींख़त्म है तुम पे मसीहानफ़सी चारागरीमेहरम-ए-दर्द-ए-जिगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं
अपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहींदस्त-ओ-बाज़ू मेरे नाकारा हुए जाते हैंजिन से हर दौर में चमकी है तुम्हारी दहलीज़आज सजदे वही आवारा हुए जाते हैँ
दूर मंज़िल थी मगर ऐसी भी कुछ दूर न थीलेके फिरती रही रास्ते ही में वहशत मुझ कोएक ज़ख़्म ऐसा न खाया के बहार आ जातीदार तक लेके गया शौक़-ए-शहादत मुझ को
राह में टूट गये पाँव तो मालूम हुआजुज़ मेरे और मेरा रहनुमा कोई नहींएक के बाद ख़ुदा एक चला आता थाकह दिया अक़्ल ने तंग आके 'ख़ुदा कोई नहीं'
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