ग़ज़ल
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करोमुझ से बिखरे हुये गेसू नहीं देखे जातेसुर्ख़ आँखों की क़सम काँपती पलकों की क़समथर-थराते हुये आँसू नहीं देखे जाते
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करोछूट जाने दो जो दामन-ए-वफ़ा छूट गयाक्यूँ ये लग़ज़ीदा ख़रामीये पशेमाँ नज़रीतुम ने तोड़ा नहीं रिश्ता-ए-दिल टूट गया
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करोमेरी आहों से ये रुख़सार न कुम्हला जायेंढूँढती होगी तुम्हें रस में नहाई हुई रातजाओ कलियाँ न कहीं सेज की मुरझा जायें
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करोमैं इस उजड़े हुये पहलू में बिठा लूँ न कहींलब-ए-शीरीं का नमक आरिज़-ए-नमकींकी मिठासअपने तरसे हुये होंठों में चुरा लूँ न कहीं
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