ग़ज़ल
चरागाँ
एक दो भी नहीं छब्बीस दियेएक इक करके जलाये मैंने
इक दिया नाम का आज़ादी केउसने जलते हुये होठों से कहाचाहे जिस मुल्क से गेहूँ माँगोहाथ फैलाने की आज़ादी है
इक दिया नाम का खुशहाली केउस के जलते ही यह मालूम हुआकितनी बदहाली हैपेत खाली है मिरा, ज़ेब मेरी खाली है
इक दिया नाम का यक़जिहती केरौशनी उस की जहाँ तक पहुँचीक़ौम को लड़ते झगड़ते देखामाँ के आँचल में हैं जितने पैबंदसब को इक साथ उधड़ते देखा
दूर से बीवी ने झल्ला के कहातेल महँगा भी है, मिलता भी नहींक्यों दिये इतने जला रक्खे हैंअपने घर में झरोखा न मुन्डेरताक़ सपनों के सजा रक्खे हैं
आया गुस्से का इक ऐसा झोंकाबुझ गये सारे दिये-हाँ मगर एक दिया, नाम है जिसका उम्मीदझिलमिलाता ही चला जाता है
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