ग़ज़ल
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।
ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी,पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने,इन मकानों को ख़बर है न, मकीनों को ख़बरउन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने ।
हाथ ढलते गए साँचों में तो थकते कैसे,नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने,की ये दीवार बुलन्द, और बुलन्द, और बुलन्द,बाम-ओ-दर और ज़रा और निखारे हमने ।
आँधियाँ तोड़ लिया करतीं थीं शामों की लौएँ,जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हमने,बन गया कस्र तो पहरे पे कोई बैठ गया,सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिए ।
अपनी नस-नस में लिए मेहनत-ए-पैहम की थकन,बन्द आँखों में इसी कस्र की तस्वीर लिए,दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक,रात आँखों में खटकती है सियाह तीर लिए ।
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी,सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।
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