ग़ज़ल
गुरुदत्त के लिए नोहा
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोईतुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुन्दरराख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई
इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगीयूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई
माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थेबे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई
साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवाअब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई
हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़मानाक्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई
अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा केनाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
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