ग़ज़ल
दाएरा
रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगेफिर वहीं लौट के आ जाता हूँबार-हा तोड़ चुका हूँ जिन कोउन्हीं दीवारों से टकराता हूँ
रोज़ बसते हैं कई शहर नएरोज़ धरती में समा जाते हैंज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मीवो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेतन कहीं धूप न साया न सराबकितने अरमान हैं किस सहरा मेंकौन रखता है मज़ारों का हिसाब
नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी हैदिल का मामूल है घबराना भीरात अन्धेरे ने अन्धेरे से कहाएक आदत है जिए जाना भी
क़ौस इक रंग की होती है तुलूएक ही चाल भी पैमाने कीगोशे-गोशे में खड़ी है मस्जिदशक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की
कोई कहता था समुन्दर हूँ मैंऔर मिरी जेब में क़तरा भी नहींख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँअब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं
अपने हाथों को पढ़ा करता हूँकभी क़ुरआँ कभी गीता की तरहचन्द रेखाओं में सीमाओं मेंज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह
राम कब लौटेंगे मालूम नहींकाश रावण ही कोई आ जाता
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