इब्राहीम ज़ौक़
1789-1854
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ दिल्ली के प्रसिद्ध उर्दू शायर और अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद थे।
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Famous Works
अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो
ये उम्र-ए-रफ़्ता की अपनी सदा-ए-पा समझो
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे
मर गये पर न लगा जी तो किधर जायेंगे
आँख उस पुर-जफ़ा से लड़ती है
जान कुश्ती क़ज़ा से लड़ती है.
आँखें मेरी तलवों से वो मिल जाए तो अच्छा
है हसरत-ए-पा-बोस निकल जाए तो अच्छा.
आज उनसे मुद्दई कुछ मुद्दआ कहने को है
यह नहीं मालूम क्या कहवेंगे क्या कहने को है
आते ही तू ने घर के फिर जाने की सुनाई
रह जाऊँ सुन न क्यूँकर ये तो बुरी सुनाई
इक सदमा दर्द-ए-दिल से मेरी जान पर तो है
लेकिन बला से यार के ज़ानू पे सर तो है
इस तपिश का है मज़ा दिल ही को हासिल होता
काश, मैं इश्क़ में सर-ता-ब-क़दम दिल होता
उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है
वो अपनी जा-नमाज़ है और ये नमाज़ है
उसे हमने बहुत ढूँढा न पाया
अगर पाया तो खोज अपना न पाया
ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ
वर्ना जिगर को रोएगा तू धर के सर पे हाथ
कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त है
हूरों पे मर रहा है ये शहवत-परस्त है
कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर
चल बसा वो आज सब हस्ती का सामाँ छोड़ कर
कहाँ तलक कहूँ साक़ी के ला शराब तो दे
न दे शराब डुबो कर कोई कबाब तो दे
क़स्द जब तेरी ज़ियारत का कभू करते हैं
चश्म-ए-पुर-आब से आईने वज़ू करते हैं
क़ुफ़्ल-ए-सद-ख़ाना-ए-दिल आया जो तू टूट गए
जो तिलिस्मात न टूटे थे कभू टूट गए
कितने मुफ़लिस हो गए कितने तवंगर हो गए
ख़ाक़ में जब मिल गए दोनों बराबर हो गए
किसी बे-कस को ऐ बे-दाद गर मारा तो क्या मारा
जो आप ही मर रहा हो उस को गर मारा तो क्या मारा
कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करे
और जो ये तंग करें मुँह से शिकायत न करे
कोई कमर को तेरी कुछ जो हो कमर तो कहे
के आदमी जो कहे बात सोच कर तो कहे
कौन वक़्त ऐ वाए गुज़रा जी को घबराते हुए
मौत आती है अजल को याँ तलक आते हुए
क्या आए तुम जो आए घड़ी दो घड़ी के बाद
सीने में होगी साँस अड़ी दो घड़ी के बाद
क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले
उनका बन्दा हूँ जो बन्दे हैं मुहब्बत वाले
गईं यारों से वो अगली मुलाक़ातों की सब रस्में
पड़ा जिस दिन से दिल बस में तेरे और दिल के हम बस में
गोहर को जौहरी सर्राफ़ ज़र को देखते हैं
बशर के हैं जो मुबस्सिर बशर को देखते हैं
चश्म-ए-क़ातिल हमें क्यूँकर न भला याद रहे
मौत इंसान को लाज़िम है सदा याद रहे
चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए
जी ही जी में तिलमिलाना कोई हम से सीख जाए
जब चला वो मुझ को बिस्मिल ख़ूँ में ग़लताँ छोड़ कर
क्या ही पछताता था मैं क़ातिल का दामाँ छोड़ कर
ज़ख़्मी हूँ तेरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से
जाने का नहीं चोर मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर से
जान के जी में सदा जीने का ही अरमाँ रहा
दिल को भी देखा किये यह भी परेशाँ ही रहा
जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा
है अपना अपना मुक़द्दर जुदा नसीब जुदा
जो कुछ के है दुनिया में वो इन्साँ के लिए है
आरास्ता ये घर इसी मेहमाँ के लिए है
तेरा बीमार न सँभला जो सँभाला लेकर
चुपके ही बैठे रहे दम को मसीहा लेकर
तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैं
सब्र ओ ताक़त के वहाँ पाँव उखड़ जाते हैं
तेरे कूचे को वोह बीमारे-ग़म दारुलशफा समझे
अज़ल को जो तबीब और मर्ग को अपनी दवा समझे