ग़ज़ल

चुपके चुपके ग़म का खाना कोई

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाएजी ही जी में तिलमिलाना कोई हम से सीख जाए
अब्र क्या आँसू बहाना कोई हम से सीख जाएबर्क़ क्या है तिलमिलाना कोई हम से सीख जाए
ज़िक्र-ए-शम्मा-ए-हुस्न लाना कोई हम से सीख जाएउन को दर-पर्दा जलाना कोई हम से सीख जाए
झूट-मूट अफ़यून खाना कोई हम से सीख जाएउन को कफ़ ला कर डराना कोई हम से सीख जाए
सुन के आमद उन की अज़-ख़ुद-रफ़्ता हो जाते हैं हमपेशवा लेने को जाना कोई हम से सीख जाए
हम ने अव्वल ही कहा था तू करेगा हम को क़त्लतेवरों का ताड़ जाना कोई हम से सीख जाए
लुत्फ़ उठाना है अगर मंज़ूर उस के नाज़ कापहले उस का नाज़ उठाना कोई हम से सीख जाए
जो सिखाया अपनी क़िस्मत ने वगरना उस को ग़ैरक्या सिखाएगा सिखाना कोई हम से सीख जाए
देख कर क़ातिल को भर लाए ख़राश-ए-दिल में ख़ूँसच तो ये है मुस्कुराना कोई हम से सीख जाए
तीर ओ पैकाँ दिल में जितने थे दिए हम ने निकालअपने हाथों घर लुटाना कोई हम से सीख जाए
कह दो क़ासिद से के जाए कुछ बहाने से वहाँगर नहीं आता बहाना कोई हम से सीख जाए
ख़त में लिखवा कर उन्हें भेजा तो मतला दर्द कादर्द-ए-दिल अपना जताना कोई हम से सीख जाए
जब कहा मरता हूँ वो बोले मेरा सर काट करझूट को सच कर दिखाना कोई हम से सीख जाए
वाँ हिले अबरू यहाँ फेरी गले पे हम ने तेग़बात का ईमा से पाना कोई हम से सीख जाए
तेग़ तो ओछी पड़ी थी गिर पड़े हम आप सेदिल को क़ातिल के बढ़ाना कोई हम से सीख जाए
ज़ख़्म को सीते हैं सब पर सोज़न-ए-अलमास सेचाक सीने के सिलाना कोई हम से सीख जाए
पूछे मुल्ला से जिसे करना हो सजदा सहव कासीखे गर अपना भुलाना कोई हम से सीख जाए
क्या हुआ ऐ 'ज़ौक़' हैं जूँ मर्दुमुक हम रू-सियाहलेकिन आँखों में समाना कोई हम से सीख जाए
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