ग़ज़ल

कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करे

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करेऔर जो ये तंग करें मुँह से शिकायत न करे
इश्क़ के दाग़ को दिल मोहर-ए-नबूवत समझाडर है काफ़िर कहीं दावा-ए-नबूवत न करे
है जराहत का मेरी सौदा-ए-अलमास इलाजफ़ाएदा उस को कभी संग-ए-जराहत न करे
हर क़दम पर मेरे अश्कों से रवाँ है दरयाक्या करे जादा अगर तर्क-ए-रफ़ाक़त न करे
आज तक ख़ूँ से मेरे तर है ज़बान-ए-ख़ंजरक्या करे जब के तलब कोई शहादत न करे
है ये इन्साँ बड़े उस्ताद का शागिर्द-ए-रशीदकर सके कौन अगर ये भी ख़िलाफ़त न करे
बिन जले शम्मा के परवाना नहीं जल सकताक्या बढ़े इश्क़ अगर हुस्न ही सब्क़त न करे
फिर चला मक़तल-ए-उश्शाक़ की जानिब क़ातिलसर पे बरपा कहीं कुश्तों के क़यामत न करे
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