ग़ज़ल

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वालेउनका बन्दा हूँ जो बन्दे हैं मुहब्बत वाले
गए जन्नत में अगर सोज़े महब्बत वालेतो ये जानो रहे दोज़ख़ ही में जन्नत वाले
न सितम का कभी शिकवा न करम की ख़्वाहिशदेख तो हम भी हैं क्या सब्र-ओ-क़नाअ़त वाले
नाज़ है गुल को नज़ाक़त पै चमन में ऐ ‘ज़ौक़’इसने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाक़त वाले
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