ग़ज़ल
जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब
जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदाहै अपना अपना मुक़द्दर जुदा नसीब जुदा
तेरी गली से निकलते ही अपना दम निकलारहे है क्यूँ के गुलिस्ताँ से अंदलीब जुदा
दिखा दे जलवा जो मस्जिद में वो बुत-ए-काफ़िरतो चीख उट्ठे मोअज़्ज़िन जुदा ख़तीब जुदा
जुदा न दर्द-ए-जुदाई हो गर मेरे आज़ाहुरूफ़-ए-दर्द की सूरत हूँ ऐ तबीब जुदा
है और इल्म ओ अदब मकतब-ए-मोहब्बत मेंके है वहाँ का मोअल्लिम जुदा अदीब जुदा
हुजूम-ए-अश्क के हम-राह क्यूँ न हो नालाके फ़ौज से नहीं होता कभी नक़ीब जुदा
फ़िराक़-ए-ख़ुल्द से गंदुम है सीना-चाक अब तकइलाही हो न वतन से कोई ग़रीब जुदा
किया हबीब को मुझ से जुदा फ़लक ने मगरन कर सका मेरे दिल से ग़म-ए-हबीब जुदा
करें जुदाई का किस किस की रंज हम ऐ ‘ज़ौक़’के होने वाले हैं हम सब से अन-क़रीब जुदा
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh