ग़ज़ल
उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है
उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ हैवो अपनी जा-नमाज़ है और ये नमाज़ है
ना-साज़ है जो हम से उसी से ये साज़ हैक्या ख़ूब दिल है वाह हमें जिस पे नाज़ है
पहुँचा है शब कमंद लगा कर वहाँ रक़ीबसच है हराम-ज़ादे की रस्सी दराज़ है
उस बुत पे गर ख़ुदा भी हो आशिक़ तो आए रश्कहर-चंद जानता हूँ के वो पाक-बाज़ है
मद्दाह-ए-ख़ाल-ए-रू-ए-बुताँ हूँ मुझे ख़ुदाबख़्शे तो क्या अजब के वो नुक्ता-नवाज़ है
डरता हूँ ख़ंजर उस का न बह जाए हो के आबमेरे गले में नाला-ए-आहन-गुदाज़ है
दरवाज़ा मै-कदे का न कर बंद मोहतसिबज़ालिम ख़ुदा से डर के दर-ए-तौबा बाज़ है
ख़ाना-ख़राबियाँ दिल-ए-बीमार-ए-ग़म की देखवो ही दवा ख़राब है जो ख़ाना-साज़ है
शबनम की जा-ए-गुल से टपकती हैं शोख़ियाँगुलशन में किस की ख़ाक-ए-शहीदान-ए-नाज़ है
आह ओ फ़ुग़ाँ न कर जो खुले 'ज़ौक़' दिल का हालहर नाला इक कलीद-ए-दर-ए-गंज-ए-राज़ है
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