ग़ज़ल

आँख उस पुर-जफ़ा से लड़ती है

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
आँख उस पुर-जफ़ा से लड़ती हैजान कुश्ती क़ज़ा से लड़ती है.
शोला भड़के न क्यूँ के महफ़िल मेंशम्मा तुझ बिन हवा से लड़ती है.
क़िस्मत उस बुत से जा लड़ी अपनीदेखो अहमक़ ख़ुदा से लड़ती है.
शोर-ए-क़ुलक़ुल ये क्यूँ है दुख़्तर-ए-रज़क्या किसी पारसा से लड़ती है.
नहीं मिज़गाँ की दो सफ़ें गोयाइक बला इक बला से लड़ती है.
निगह-ए-नाज़ उस की आशिक़ सेछूट किस किस अदा से लड़ती है.
तेरे बीमार के सर-ए-बालींमौत क्या क्या शिफ़ा से लड़ती है.
ज़ाल-ए-दुन्या ने सुल्ह की किस दिनये लड़ाका सदा से लड़ती है.
वाह क्या क्या तबीअत अपनी भीइश्क़ में इब्तिदा से लड़ती है.
देख उस चश्म-ए-मस्त की शोख़ीजब किसी पारसा से लड़ती है.
तेरी शमशीर-ए-ख़ूँ के छींटों सेछींटे आब-ए-बक़ा से लड़ती है.
सच है अल-हर्ब ख़ुदअतुन ऐ 'ज़ौक़'निगह उस की दग़ा से लड़ती है.
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