ग़ज़ल
आते ही तू ने घर के फिर जाने की
आते ही तू ने घर के फिर जाने की सुनाईरह जाऊँ सुन न क्यूँकर ये तो बुरी सुनाई
मजनूँ ओ कोह-कन के सुनते थे यार क़िस्सेजब तक कहानी हम ने अपनी न थी सुनाई
शिकवा किया जो हम ने गाली का आज उस सेशिकवे के साथ उस ने इक और भी सुनाई
कुछ कह रहा है नासेह क्या जाने क्या कहेगादेता नहीं मुझे तो ऐ बे-ख़ुदी सुनाई
कहने न पाए उस से सारी हकीक़त इक दिनआधी कभी सुनाई आधी कभी सुनाई
सूरत दिखाए अपनी देखें वो किस तरह सेआवाज़ भी न हम को जिस ने कभी सुनाई
क़ीमत में जिंस-ए-दिल की माँगा जो 'ज़ौक़' बोसाक्या क्या न उस ने हम को खोटी-खरी सुनाई
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