बहादुर शाह ज़फ़र
1775-1862
बहादुर शाह ज़फ़र मुग़ल साम्राज्य के अंतिम बादशाह और एक संवेदनशील शायर थे।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-बेदाद-ओ-यार में
इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल
दुनिया है चल-चलाओ का रस्ता सँभल के चल.
इश्क़ तो मुश्किल है ऐ दिल कौन कहता सहल है
लेक नादानी से अपनी तू ने समझा सहल है.
करेंगे क़स्द हम जिस दम तुम्हारे घर में आवेंगे
जो होगी उम्र भर की राह तो दम भर में आवेंगे.
क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला
दुनिया से क्या बख़ील ब-जुज़ रंज ले चला.
काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत तो परी दी
पर हैफ़ तेरे दिल में मोहब्बत न ज़री दी.
कीजे न दस में बैठ कर आपस की बातचीत
पहुँचेगी दस हज़ार जगह दस की बातचीत
क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँकर हुआ
ये भला चंगा गिरफ़्तार-ए-बला क्यूँकर हुआ.
क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते
कुछ करते हैं ऐसा ब-ख़ुदा कुछ नहीं करते.
क्यूँकर न ख़ाक-सार रहें अहल-ए-कीं से दूर
देखो ज़मीं फ़लक से फ़लक है ज़मीं से दूर.
क्यूँके हम दुनिया में आए कुछ सबब खुलता नहीं
इक सबब क्या भेद वाँ का सब का सब खुलता नहीं.
ख़्वाह कर इंसाफ़ ज़ालिम ख़्वाह कर बे-दाद तू
पर जो फ़रयादी हैं उन की सुन तो ले फ़रयाद तू.
खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर
गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है अगर बट जाएगी
आशिक़ों के घर मिठाई लब-ए-शकर बट जाएगी.
जब कभी दरया में होते साया-अफ़गन आप हैं
फ़िल्स-ए-माही को बताते माह-ए-रौशन आप हैं.
जब के पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो
गिर्ये से शाम ओ सहर क्यूँ के हमें काम न हो.
ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तेरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई
हम को अपनी तीरा-रोज़ी की हक़ीक़त खुल गई.
जा कहियो उन से नसीम-ए-सहर मेरा चैन गया मेरी नींद गई
तुम्हें मेरी न मुझ को तुम्हारी ख़बर मेरा चैन गया मेरी नींद गई
जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ
ये इश्क़ जान को मेरे कोई अज़ाब हुआ.
टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच
सुरख़ाब बैठे पानी में हैं मिल के चार पाँच.
तफ़्ता-जानों का इलाज ऐ अहल-ए-दानिश और है
इश्क़ की आतिश बला है उस की सोज़िश और है.
तुम न आये एक दिन का वादा कर दो दिन तलक
हम पड़े तड़पा किये दो-दो पहर दो दिन तलक
थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं
जो खो गये हैं या रब वो औसाँ कहाँ हैं
दिल की मेरी बेक़रारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
शब की मेरी आह-ओ-ज़ारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
देख दिल को मेरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़
घर है अल्लाह का ये इस की तो तामीर न तोड़.
देखो इन्साँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है
बोलता है इस में क्या वो बोलता क्या चीज़ है.
न उस का भेद यारी से न अय्यारी से हाथ आया
ख़ुदा आगाह है दिल की ख़बर-दारी से हाथ आया.
न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना
मुझे तो होश दे इतना रहूँ मैं तुझ पे दीवाना.
न दाइम ग़म है नै इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है
तबद्दुल याँ है हर साअत कभी यूँ है कभी वूँ है.
न दो दुश्नाम हम को इतनी बद-ख़़ूई से क्या हासिल
तुम्हें देना ही होगा बोसा ख़म-रूई से क्या हासिल.
नहीं इश्क़ में उस का तो रंज हमें के क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा
ग़म-ए-इश्क़ तो अपना रफ़ीक़ रहा कोई और बला से रहा न रहा.
निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ
उधर से क्या न हुआ पर इधर से कुछ न हुआ.
पसे-मर्ग मेरी मजार पर जो दिया किसी ने जला दिया ।
उसे आह! दामन-ए-बाद ने सरेशाम ही से बुझा दिया ।।
पान की सुर्ख़ी नहीं लब पर बुत-ए-ख़ूँ-ख़्वार के
लग गया है ख़ून-ए-आशिक़ मुँह को इस तलवार के.
पान खा कर सुरमा की तहरीर फिर खींची तो क्या
जब मेरा ख़ूँ हो चुका शमशीर फिर खींची तो क्या.
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी