ग़ज़ल
जब के पहलू में हमारे
जब के पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न होगिर्ये से शाम ओ सहर क्यूँ के हमें काम न हो.
ले गया दिल का जो आराम हमारे या रबउस दिल-आराम को मुतलक़ कभी आराम न हो.
जिस को समझे लब-ए-पाँ-ख़ुर्दा वो मालिदा-मिसीमर्दुमाँ देखियो फूली वो कहीं शाम न हो.
आज तशरीफ़ गुलिस्ताँ में वो मै-कश लायाकफ़-ए-नर्गिस पे धरा क्यूँके भला जाम न हो.
कर मुझे क़त्ल वहाँ अब के न हो कोई जहाँता मेरी जाँ तू कहीं ख़ल्क़ में बद-नाम न हो.
देख कर खोलियो तू काकुल-ए-पेचाँ की गिरहके मेरा ताइर-ए-दिल उस के तह-ए-दाम न हो.
बिन तेरे ऐ बुत-ए-ख़ुद-काम ये दिल को है ख़तरतेरे आशिक़ का तमाम आह कहीं काम न हो.
आज हर एक जो यारो नज़र आता है निढालअपनी अबरू की वो खींचे हुए समसाम न हो.
है मेरे शोख़ की बालीदा वो काफ़िर आँखेंजिस के हम चश्म ज़रा नर्गिस-ए-बादाम न हो.
सुब्ह होती ही नहीं और नहीं कटती रातरुख़ पे खोले वो कहीं जुल्फ-ए-सियह-फ़ाम न हो.
ऐ ‘ज़फ़र’ चर्ख़ पे ख़ुर्शीद जो यूँ काँपे हैजलवा-गर आज कहीं यार लब-ए-बाम न हो.
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