ग़ज़ल

न उस का भेद यारी से

बहादुर शाह ज़फ़र · सब कलाम देखें
न उस का भेद यारी से न अय्यारी से हाथ आयाख़ुदा आगाह है दिल की ख़बर-दारी से हाथ आया.
न हों जिन के ठिकाने होश वो मंज़िल को क्या पहुँचेके रस्ता हाथ आया जिस की हुश्यारी से हाथ आया.
हुआ हक़ में हमारे क्यूँ सितम-गार आसमाँ इतनाकोई पूछे के ज़ालिम क्या सितम-गारी से हाथ आया.
अगर-चे माल-ए-दुन्या हाथ भी आया हरीसों केतो देखा हम ने किस किस ज़िल्लत ओ ख़्वारी से हाथ आया.
न कर ज़ालिम दिल-आज़ारी जो दिल मंज़ूर है लेनाकिसी का दिल जो हाथ आया तो दिल-दारी से हाथ आया.
अगर-चे ख़ाक-सारी कीमिया का सहल नुस्ख़ा हैव-लेकिन हाथ आया जिस के दुश्वारी से हाथ आया.
हुई हरगिज़ न तेरे चश्म के बीमार को सेहतन जब तक ज़हर तेरे ख़त्त-ए-ज़ंगारी से हाथ आया.
कोई ये वहशी-ए-रम-दीदा तेरे हाथ आया थापर ऐ सय्याद-वश दिल की गिरफ़्तारी से हाथ आया.
‘ज़फ़र’ जो दो जहाँ में गोहर-ए-मक़सूद था अपनाजनाब-ए-फ़ख़्र-ए-दीं की वो मदद-गारी से हाथ आया.
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