ग़ज़ल

तफ़्ता-जानों का इलाज ऐ

बहादुर शाह ज़फ़र · सब कलाम देखें
तफ़्ता-जानों का इलाज ऐ अहल-ए-दानिश और हैइश्क़ की आतिश बला है उस की सोज़िश और है.
क्यूँ न वहशत में चुभे हर मू ब-शक्ल-ए-नीश-तेज़ख़ार-ए-ग़म की तेरे दीवाने की काविश और है.
मुतरिबो बा-साज़ आओ तुम हमारी बज़्म मेंसाज़-ओ-सामाँ से तुम्हारी इतनी साज़िश और है.
थूकता भी दुख़्तर-ए-रज़ पर नहीं मस्त-ए-अलस्तजो के है उस फ़ाहिशा पर ग़श वो फ़ाहिश और है.
ताब क्या हम-ताब होवे उस से खुर्शीद-ए-फ़लकआफ़ताब-ए-दाग़-ए-दिल की अपने ताबिश और है.
सब मिटा दें दिल से हैं जितनी के उस में ख़्वाहिशेंगर हमें मालूम हो कुछ उस की ख़्वाहिश और है.
अब्र मत हम-चश्म होना चश्म-ए-दरया-बार सेतेरी बारिश और है और उस की बारिश और है.
है तो गर्दिश चर्ख़ की भी फ़ितना-अंगेज़ी में ताक़तेरी चश्म-ए-फ़ितना-ज़ा की लेक गर्दिश और है.
बुत-परस्ती जिस से होवे हक़-परस्ती ऐ 'ज़फ़र'क्या कहूँ तुझ से के वो तर्ज़-ए-परस्तिश और है.
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh