ग़ज़ल
न दाइम ग़म है नै इशरत
न दाइम ग़म है नै इशरत कभी यूँ है कभी वूँ हैतबद्दुल याँ है हर साअत कभी यूँ है कभी वूँ है.
गिरेबाँ-चाक हूँ गाहे उड़ाता ख़ाक हूँ गाहेलिए फिरती मुझे वहशत कभी यूँ है कभी वूँ है.
अभी हैं वो मेरे हम-दम अभी हो जाएँगे दुश्मननहीं इक वज़ा पर सोहबत कभी यूँ है कभी वूँ है.
जो शक्ल-ए-शीशा गिर्यां हूँ तो मिस्ल-ए-जाम ख़ंदाँ हूँयही है याँ की कैफ़िय्यत कभी यूँ है कभी वूँ है.
किसी वक़्त अश्क हैं जारी किसी वक़्त आह और ज़ारीग़रज़ हाल-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त कभी यूँ है कभी वूँ है.
कोई दिन है बहार-ए-गुल फिर आख़िर है ख़ज़ाँ बिल्कुलचमन है मंजिल-ए-इबरत कभी यूँ है कभी वूँ है.
'ज़फ़र' इक बात पर दाइम वो होवे किस तरह क़ाइमजो अपनी फेरता नीयत कभी यूँ है कभी वूँ है.
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