ग़ज़ल

इश्क़ तो मुश्किल है ऐ दिल

बहादुर शाह ज़फ़र · सब कलाम देखें
इश्क़ तो मुश्किल है ऐ दिल कौन कहता सहल हैलेक नादानी से अपनी तू ने समझा सहल है.
गर खुले दिल की गिरह तुझ से तो हम जानें तुझेऐ सबा ग़ुंचे का उक़दा खोल देना सहल है.
हम-दमो दिल के लगाने में कहो लगता है क्यापर छुड़ाना इस का मुश्किल है लगाना सहल है.
गरचे मुश्किल है बहुत मेरा इलाज-ए-दर्द-ए-दिलपर जो तू चाहे तो ऐ रश्क-ए-मसीहा सहल है.
है बहुत दुश्वार मरना ये सुना करते थे हमपर जुदाई में तेरी हम ने जो देखा सहल है.
शम्मा ने जल कर जलाया बज़्म में परवाने कोबिन जले अपने जलाना क्या किसी का सहल है.
इश्क़ का रस्ता सरासर है दम-ए-शमशीर परबुल-हवस इस राह में रखना क़दम क्या सहल है.
ऐ ‘ज़फ़र’ कुछ हो सके तो फ़िक्र कर उक़बा का तूकर न दुनिया का तरद्दुद कार-ए-दुन्या सहल है.
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