ग़ज़ल

खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर

बहादुर शाह ज़फ़र · सब कलाम देखें
खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैरपर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर
मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से वोआयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लेंलब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर
बेदर्द तू सुने न सुने लेकिन ये दर्द-ए-दिलरहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़तर कहे बग़ैर
तकदीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भीदिलवाता ऐ "ज़फ़र" है मुक़द्दर कहे बग़ैर
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