ग़ज़ल
न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए
न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहानामुझे तो होश दे इतना रहूँ मैं तुझ पे दीवाना.
किताबों में धरा है क्या बहुत लिख लिख के धो डालींहमारे दिल पे नक़्श-ए-कल-हज्र है तेरा फ़रमाना.
ग़नीमत जान जो दम गुजरे कैफ़ियत से गुलशन मेंदिए जा साक़ी-ए-पैमाँ-शिकन भर भर के पैमाना.
न देखा वो कहीं जलवा जो देखा ख़ाना-ए-दिल मेंबहुत मस्जिद में सर मारा बहुत सा ढूँढा बुत-ख़ाना.
कुछ ऐसा हो के जिस से मंज़िल-ए-मक़सूद को पहुँचूँतरीक़-ए-पारसाई होवे या हो राह-ए-रिंदाना.
ये सारी आमद-ओ-शुद है नफ़स की आमद-ओ-शुद परइसी तक आना जाना है न फिर जाना न फिर आना.
'ज़फ़र' वो ज़ाहिद-ए-बे-दर्द की हू-हक़ से बेहतर हैकरे गर रिंद दर्द-ए-दिल से हाव-हु-ए-मस्ताना.
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