ग़ज़ल
थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं
थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैंजो खो गये हैं या रब वो औसाँ कहाँ हैं
आँखों में रोते-रोते नम भी नहीं अब तोथे मौजज़न जो पहले वो तूफ़ाँ कहाँ हैं
कुछ और ढब अब तो हमें लोग देखते हैंपहले जो ऐ "ज़फ़र" थे वो इन्साँ कहाँ हैं
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