वसीम बरेलवी

वसीम बरेलवी

1940-present
वसीम बरेलवी समकालीन उर्दू के लोकप्रिय शायर और गीतकार हैं।
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Famous Works

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसेतेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे
अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगाउसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा
आपको देख कर देखता रह गयाक्या कहूँ और कहने को क्या रह गया
उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी हैपरों की अब के नहीं हौसलों की बारी है
उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी हैजो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है
कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगामेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा
कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगेमेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे
कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भीतुझी से फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी
कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती हैये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है
क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकताआँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता
क्या बताऊं कैसे ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया,उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया ।
खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहींऔर मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं
जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है,समंदरो ही के लहजे में बात करता है।
तुझको सोचा तो पता हो गया रुसवाई कोमैंने महफूज़ समझ रखा था तन्हाई को
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आतेइसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते
मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारोके मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो
====इस पुस्तक में संकलित रचनाएँ====*
मैं अपने ख़्वाब से बिछ्ड़ा नज़र नहीं आतातू इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता
मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगाअब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा
रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ देशम्अ से कहना के जलना छोड़ दे
लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होताहमारे दौर में आँसू ज़ुबाँ नहीं होता
हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआआया पलको पे तो आँसू का सफ़र ख़त्म हुआ