ग़ज़ल
कौन-सी बात कहाँ , कैसे कही जाती है
कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती हैये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है
जैसा चाहा था तुझे, देख न पाये दुनियादिल में बस एक ये हसरत ही रही जाती है
एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जानेकैसे माँ-बाप के होंठों से हँसी जाती है
कर्ज़ का बोझ उठाये हुए चलने का अज़ाबजैसे सर पर कोई दीवार गिरी जाती है
अपनी पहचान मिटा देना हो जैसे सब कुछजो नदी है वो समंदर से मिली जाती है
पूछना है तो ग़ज़ल वालों से पूछो जाकरकैसे हर बात सलीक़े से कही जाती है
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