ग़ज़ल

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता

वसीम बरेलवी · सब कलाम देखें
क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकताआँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता
तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्याहर शख़्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता
प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालातकिसके लिए ज़िन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता
घर ढूँढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारीमैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता
वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाएऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता.
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh