ग़ज़ल
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसेतेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे
घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का हैपहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे
क़हक़हा आँख का बर्ताव बदल देता हैहँसने वाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे
कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगाएक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे
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