ग़ज़ल

क्या बताऊं कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया

वसीम बरेलवी · सब कलाम देखें
क्या बताऊं कैसे ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया,उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया ।
तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा उस शिद्दत के साथ,जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया ।
कैसे बच्चों को बताऊँ रास्तों के पेचो-ख़मज़िन्दगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया ।
शोहरतों की नज़्र कर दी शे’र की मासूमियत,इस दिये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया ।
चंद जज़्बातों से रिश्तों के बचाने को ‘वसीम‘,कैसा-कैसा जब्र अपने आप पर मैंने किया ।
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