ग़ज़ल
अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगाउसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा
तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहींमैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा
मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़ररास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा
सारी दुनिया की नज़र में है मेरी अह्द—ए—वफ़ाइक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh