ग़ज़ल

कही सुनी पे बहुत एतबार करने लगे

वसीम बरेलवी · सब कलाम देखें
कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगेमेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे
पुराने लोगों के दिल भी हैं ख़ुशबुओं की तरहज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे
नए ज़माने से आँखें नहीं मिला पायेतो लोग गुज़रे ज़माने से प्यार करने लगे
कोई इशारा, दिलासा न कोई वादा मगरजब आई शाम तेरा इंतज़ार करने लगे
हमारी सादा -मिजाज़ी की दाद दे कि तुझेबग़ैर परखे तेरा एतबार करने लगे.
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