ग़ज़ल
लहू न हो तो क़लम
लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होताहमारे दौर में आँसू ज़ुबाँ नहीं होता
जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगाकिसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता
ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तनहाईके मुझ से आज कोई बदगुमाँ नहीं होता
मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगाकिसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता
'वसीम' सदियों की आँखों से देखिये मुझ कोवो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh