मतिराम
1617-1710
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Famous Works
आनन पूरनचंद लसै अरबिंद –बिलास- बिलोचन पेखे .
अंबर पीत लसै चपला छबि अम्बुद मेचक अंग उरेखे .
आवत मैँ सपने हरि को लखि नैसुक बाँट सँकोचन छोड़ी ।
आगे ह्वै आड़े भए मतिराम मँहू चितयोँ चित लालच ओड़ी ।
कुंदन को रँगु फीको लगै, झलकै अति अंगन चारु गुराई।
ऑंखिन में अलसानि चितौन में, मंजु बिलासन की सरसाई॥
केलि की राति अघाने नहीँ दिन ही मे लला पुनि घात लगाई ।
प्यास लगी कोउ पानी दै जाउ योँ भीतर बैठि कै बैन सुनाई ।
केलि की राति अघाने नहीं, दिनँ मैं लला पुनि घात लगाई।
प्यास लगी कोउ पानी दै जाउ, यों भीतर बैठि कै बात सुनाई॥
कोऊ नहीँ बरजै मतिराम रहौ तितही जितही मन भायो ।
काहे को सौँहैँ हजार करौ तुमतो कबहूँ अपराध न ठायो ।
क्यों इन आँखिन सौं निरसंक ह्वै मोहन को तन पानिप पीजै.
नेक निहारे कलंक लगै इहि गाँव बसे कहौ कैसे के जीजे .
गुच्छनि के अवतंस लसै सिशि –पच्छनि अच्छ किरीट बनायो .
पल्लव लाल समेत छरी कर पल्लव -सो ‘मतिराम’ सुहायो .
चरन धरै न भूमि बिहरै तहाँई जहाँ ,
फूले फूले फूलनि बिछायो परयँक है ।
जा दिन तैं छवि सौं मुसुकात, कँ निरखे नंदलाल बिलासी।
ता दिन तैं मन-ही-मन मैं, 'मतिराम पियै मुसकानि सुधा सी॥
जावक लिलार ओँठ अँजन की लीक सोहै ,
खैये न अलीक लोक लीक न बिसारिए ।
दूसरे की बात सुनि परत न ऎसी जहाँ ,
कोकिल कपोतन की धुनि सरसात है ।
दोऊ अनंद सो अनंद माँझ बिराजै असाढ की साँझ दुहाई .
प्यारी के बूझत और तिया को अचानक नाम लियो रसिकार.
फूलति कली गुलाब की, सखि यह रूप लखैन।
मनों बुलावति मधुप कों, दै चुटकी की सैन।।91।।
मो मन तम-तोमहि हरौ, राधा को मुखचंद।
बढ़ै जाहि लखि सिंधु लौं, नँद-नंदन आनन्द।।1।।
झूठे ही ब्रज में लग्यो, मोहिं कलंक गुपाल।
सांचे हूँ कबहूँ हिये, लगे न तुम नंदलाल।।11।।
मन दैसुनिए लाल यह, तनक तरुनि की बात।
अंसुवा उड़गन गिरत हैं, होन चहत उतपात।।21।।
सखी सलोनी देह में, सजे सिंगार अनेक!
कजरारी अँखियानि में, भूल्यो काजर एक।।31।।
तरु ह्वै रह्यो करार कौ, अब करि कहा करार।
उर धरि नंदकुमार कौ, चरन कमल सुकुमार।।41।।
सुखद साधुजन को सदा, गजमुख दानि उदार।
सेवनीय सब जगत कौ, जग मां बाप कुमार।।51।।
प्रगट कुटिलता जो करी, हम पर स्याम सरोस।
मधुप जोग बिख उगिलियै, कछु न तिहारो रोस।।61।।
स्यामरूप अभिराम अति, सकल बिमल गुनधाम।
तुम निसिदिन मतिराम की, मतिबिसरौ मतिराम।।71।।
देखि परे नहिं दूबरी, सुनियें स्याम सुजान।
जानि परे परजंक में, अंग आँच अनुमान।।81।।
पाँव धरे दुलही जिहि ठौर रहे मतिराम तहाँ दृग दीने ।
छोड़ि सखान के साथ को खेलिबो बैठि रहे घर ही रस भीने ।
पाँयन आय परै तो परे रहैं केती करी मनुहारि सहेली ।
मान्यो मनायो न मैँ 'मतिराम' गुमान मे ऐसी भई अलबेली ।
प्रान पियारो मिल्यो सपने मैं, परी जब नैंसुक नींद निहोरैं।
कंत को आगम ज्यों ही जगाय, कह्यो सखी बोल पियूष निचोरैं॥
प्रीतम आए प्रभात प्रिया, मुसक्याय उठी दृग सों दृग जोरै।
आगे ह्वै आदर कै 'मतिराम', कहै मृदु बैन सुधा रस बोरैं।।
बरज्यो न मानत है बार बार बरज्यो मैँ ,
कौन काम मेरे इत भौन मैँ न आइए ।
बारनि धूपि अँगारनि धूप कैँ धूम अँध्यारी पसारी महा है ।
आनन चँद समान उगो मृदु मँद हँसी जनु जोन्ह छटा है ।
मोर पखा ‘मतिराम’ किरीट मैं कंठ बनी बनमाल सुहाई .
मोहन की मुसकानि मनोहर कुंडल डोलनि मैं छबि आई .
मोर पखानि किरीट बन्यो मुकुतानि के कुंडल स्रौन बिलासी .
चारु चितौनि चुभी ‘मतिराम’ सुक्यों बिसरै मुस्कानि सुधा - सी .
याही को पठाई बड़ो काम करि आई बड़ी ,
तेरी है बड़ाई लख्यो लोचन लजीले सोँ ।
रावरे नेह को लाज तजी अरु, गेह के काम सबै बिसरायो।
डारि दयो गुरु लोगन कौ डर, गाँव-चवाईं में नाम धरायो।।
सहज सुबासयुत देह की दुगुनि दुति ,
दामिनि दमक दीप केसरि कनक ते ।
साँझहिं ते करि राखै सबै करिबे के काज हुते रजनी के ।
पौढ़ि रही उमगी अति ही मतिराम अनन्द अमात न जी के।।
सुँदर बदन राधे सोभा को सदन तेरौ ,
बदन बनायो चारि बदन बनाय कै ।
सुबन को मेट दिल्ली देस दलिबे को चूम,
सुभट समूह निसि वाकी उमहति है.
सो मनमोहन होत लटू, मुख जाके भटू बिधु की छबि छाजै।
खेलि कै नैननि देखै जो नेक, तो स्याम सरोज पराजय साजै।।
सोने की सी बेली अति सुँदर नबेली बाल ,
ठाढ़ी ही अकेली अलबेली द्वार महियाँ ।
सोय रहि रति-अन्त रसीली, अनन्द बढ़ाय अनंग-तरंगनि।
केसरि खौर करी तिय के तन, प्रीतम और सुवास के संगनि।।