ग़ज़ल

दूसरे की बात सुनि परत न ऐसी जहाँ

मतिराम · सब कलाम देखें
दूसरे की बात सुनि परत न ऎसी जहाँ ,कोकिल कपोतन की धुनि सरसात है ।छाइ रहे जहाँ द्रुम बेलिनि सोँ मिलि ,मतिराम अलिकुलनि अँध्यारी अधिकात है ।नखत से फूलि रहे फूलन के पुँज घन ,कुँजन मे होत जहाँ दिनहूँ मे राति है ।ता बन की बाट कोऊ सँग न सहेली कहि ,कैसे तू अकेली दधि बेचन को जाति है ॥
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