ग़ज़ल
सुँदर बदन राधे सोभा को सदन तेरौ
सुँदर बदन राधे सोभा को सदन तेरौ ,बदन बनायो चारि बदन बनाय कै ।ताकी रुचि लैन को उदित भयो रैनपति ,मूढ़मति राख्यो निज कर बगराय कै ।मतिराम कहै निसिचर चोर जानि याँहि ,दीनी है सजाय कमलासन रिसाय कै ।रातौ दिन फैरे अमरालय के आस पास ,मुख मे कलँक मिस कारिख लगाय कै ॥
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