ग़ज़ल
सोने की सी बेली अति सुँदर नबेली बाल
सोने की सी बेली अति सुँदर नबेली बाल ,ठाढ़ी ही अकेली अलबेली द्वार महियाँ ।मतिराम आँखिन सुधा की बरखा सी भई ,गई जब दीठि वाके मुखचँद पहियाँ ।नेकु नीरे जाय करि बातनि लगाय करि ,कछु मन पाय हरि बाकी गही बहियाँ ।चैनन चरचि लई सैनन थकित भई ,नैनन मे चाह करै बैनन मेँ नहियाँ ।
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