ग़ज़ल
जा दिन तैं छवि सौं मुसुकात
जा दिन तैं छवि सौं मुसुकात, कँ निरखे नंदलाल बिलासी।ता दिन तैं मन-ही-मन मैं, 'मतिराम पियै मुसकानि सुधा सी॥
नेकु निमेष न लागत नैन, चकै चितवै तिय देव-तिया सी।चंदमुखी न चलै न हिलै, निरबात निवास मैं दीपसिखा सी॥
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