गिरिधर कविराय

गिरिधर कविराय

18th c.
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कमरी थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥
गुनके गाहक सहस नर, बिन गुन लहै न कोय ।जैसे कागा-कोकिला, शब्द सुनै सब कोय ।
चिंता ज्वाल सरीर की, दाह लगे न बुझाय।प्रकट धुआं नहिं देखिए, उर अंतर धुंधुवाय॥
जाको धन, धरती हरी, ताहि न लीजै संग।ओ संग राखै ही बनै, तो करि राखु अपंग॥
जानो नहीं जिस गाँव में, कहा बूझनो नाम ।तिन सखान की क्या कथा, जिनसो नहिं कुछ काम ॥
झूठा मीठे वचन कहि, ॠण उधार ले जाय।लेत परम सुख उपजै, लैके दियो न जाय॥
दौलत पाय न कीजिए, सपनेहु अभिमान।चंचल जल दिन चारिको, ठाउं न रहत निदान॥
पानी बाढो नाव में, घर में बाढो दाम।दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥
बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।काम बिगारै आपनो, जग में होत हंसाय॥
बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देइ॥
रहिये लटपट काटि दिन, बरु घामें मां सोय।छांह न वाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय॥
लाठी में हैं गुण बहुत, सदा रखिये संग।गहरि नदी, नाली जहाँ, तहाँ बचावै अंग।।
सांई अपने चित्त की, भूलि न कहिये कोइ।तब लगि मन में राखिये, जब लगि कारज होइ॥
सांई अवसर के परे, को न सहै दु:ख द्वंद।जाय बिकाने डोम घर, वै राजा हरिचंद॥
सांई सब संसार में, मतलब को व्यवहार।जब लग पैसा गांठ में, तब लग ताको यार॥
साईं, बैर न कीजिए, गुरु, पंडित, कवि, यार ।बेटा, बनिता, पँवरिया, यज्ञ–करावनहार ॥
साईं अपने चित्त की, भूलि न कहिये कोइ।तब लगि मन में राखिये, जब लगि कारज होइ॥
साईं अपने भ्रात को, कबहुं न दीजै त्रासपलक दूर नहिं कीजिये, सदा राखिये पास
साईं घोड़े आछतहि गदहन आयो राजकौआ लीजै हाथ में दूरि कीजिये बाज
साईं तहां न जाइये जहां न आपु सुहायवर्ण विषै जाने नहीं, गदहा दाखै खाय
साईं बेटा बाप के बिगरे भयो अकाजहरनाकुस अरु कंस को गयो दुहुन को राज
साईं सब संसार में, मतलब को व्यवहार।जब लग पैसा गांठ में, तब लग ताको यार॥
साईं सुआ प्रवीन गति वाणी वदन विचित्तरूपवंत गुण आगरो राम नाम सों चित्त
सोना लादन पिय गए, सूना करि गए देस।सोना मिले न पिय मिले, रूपा ह्वै गए केस॥