ग़ज़ल
साईं अपने चित्त की
साईं अपने चित्त की, भूलि न कहिये कोइ।तब लगि मन में राखिये, जब लगि कारज होइ॥
जब लगि कारज होइ, भूलि कबं नहिं कहिये।दुरजन हंसै न कोय, आप सियरे ह्वै रहिये।
कह 'गिरिधर कविराय बात चतुरन के र्ताईं।करतूती कहि देत, आप कहिये नहिं साईं॥
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